अमेरिकी ख़ुफ़िया विभाग की प्रमुख तुलसी गबार्ड ने ईरान, पाकिस्तान नॉर्थ कोरिया, रूस और चीन के मिसाइल कार्यक्रम को ‘अमेरिका के लिए ख़तरा’ बताया. पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी चिंता का मुख्य कारण उसके द्वारा दशकों से आतंकवाद का पोषण करना और पूरे विश्व के आतंकवादीओं को ट्रैनिंग देना शामिल है। दुनिया में पिछले 40 सालों में जितनी भी आतंकी घटनायें हुईं हैं उनका जनक और पनाहगार पाकिस्तान ही रहा है।
अमेरिकी पूर्व कांग्रेस सदस्य तुलसी गबार्ड ने हाल ही में एक बयान में वैश्विक आतंकवाद से संबंधित कई गंभीर चिंताओं को उठाया। उन्होंने प्रमुख देशों जैसे रूस, चीन, उत्तर कोरिया, ईरान और पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रमों को एक संभावित खतरे के रूप में रेखांकित किया। गबार्ड का तर्क है कि ये देशों के मिसाइल कार्यक्रम न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को बाधित कर रहे हैं, बल्कि अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
गबार्ड ने यह भी बताया कि पाकिस्तान का मिसाइल कार्यक्रम विशेष रूप से चिंताजनक है। उन्हें लगता है कि पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य क्षमताएँ, विशेष रूप से परमाणु मिसाइलों के संदर्भ में, न केवल दक्षिण एशिया में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे सकती हैं। इस बयान में गबार्ड ने जोर दिया कि इन देशों की गतिविधियों को नजरअंदाज करना या उनसे आंख बंद करना अमेरिका के लिए एक बड़ी गलती होगी।
इसके अलावा, गबार्ड ने कहा कि अमेरिका को इन खतरों का उचित मूल्यांकन करना चाहिए और एक सुसंगत और सक्षम रणनीति विकसित करनी चाहिए। उनके विचार में, यह न केवल अमेरिका के लिए बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह चेतावनी इस बात को उजागर करती है कि तकनीकी वृद्धि और वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य के कारण हो रहे संकटों को समझना और उन पर ध्यान केंद्रित करना अत्यंत आवश्यक है।
गबार्ड की चिंताएँ यह दिखाती हैं कि कैसे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खतरे का प्रभाव केवल एक विशेष देश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक चुनौती है। उनके विचारों के अनुसार, अमेरिका और अन्य देशों को इस खतरे के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है ताकि आवश्यक कदम उठाए जा सकें।
पाकिस्तान की आतंकवाद में भूमिका
पाकिस्तान ने पिछले कई दशकों में आतंकवाद को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जो कि न केवल क्षेत्रीय स्तर पर बल्कि वैश्विक स्तर पर भी चिंताजनक है। शुरुआत में, इसे किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया गया, जिसके अंतर्गत अमेरिका और पाकिस्तान की सरकारों द्वारा कई आतंकवादी समूहों को समर्थन प्रदान किया गया। इन संगठनों को न केवल वित्तीय सहायता प्रदान की गई, बल्कि उन्हें प्रशिक्षण और सैन्य उपकरण भी मुहैया कराए गए। यह स्थिति पाकिस्तान को आतंकवाद का एक प्रमुख केंद्र बनाने में सहायक रही है।

वर्ष 1947 में भारत से अलग होने के बाद पाकिस्तान में सैन्य सरकारों ने जनता के लिए शिक्षा, विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर आदि पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय भ्रस्टाचार और सत्ता पर काबिज होने के लिए चीन, अमेरिका से सांठगांठ करने पर अधिक ध्यान दिया। अशिक्षित समाज, गरीबी और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बिना पाकिस्तान की सैन्य सरकारों ने सैन्य और खुफिया एजेंसियों को आतंकवादी संगठनों की मदद करने की एक व्यापक रणनीति अपनाई है। इन्हें अफगानिस्तान में सोवियत आक्रमण के दौरान प्रोत्साहन मिला, जब अंततः ये समूह भविष्य में भारत सहित विश्व के अन्य देशों के खिलाफ गतिविधियों में संलग्न हुए। इसके अलावा, पाकिस्तान ने अपनी सीमाओं के भीतर आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर स्थापित किए हैं, जो वैश्विक स्तर पर आतंकवाद को प्रेरित करने में सहायक रहे हैं।
पाकिस्तान में स्थित आतंकी संगठन भारत, अफगानिस्तान और अन्य देशों के खिलाफ भी गतिविधियाँ कर रहे हैं। गत वर्षों में दुनिया हुए कई आतंकवादी हमलों का संबंध सीधे तौर पर पाकिस्तानी संगठनों से हैं। इसके परिणामस्वरूप, वैश्विक आतंकवाद पर काबू पाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका सहित कई देश पाकिस्तान को अपने राजनीतिक दृष्टिकोण को फिर से जांचने और आतंकवाद के प्रति अपनी नीति में बदलाव करने का दबाब बनाते रहते हैं।
अंतरराष्ट्रीय चिंता का कारण
पाकिस्तान भौगोलिक दृष्टि से ईरान और अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम देशों के साथ सीमा साझा करता है और हाल के वर्षों में वैश्विक आतंकवाद को प्रायोजित करने और बढ़ाने में उसके द्वारा योगदान को लेकर दुनिया के देशों में शान्ति और सुरक्षा के लिए गंभीर चिंताओं का विषय बन गया है। अमेरिका सहित कई देशों का मानना है कि पाकिस्तान की आतंकवादी संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई की कमी ने, न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित किया है, बल्कि विश्व स्तर पर भी सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। पाकिस्तान में सक्रिय कई आतंकवादी समूह हैं जो न केवल स्थानीय, बल्कि वैश्विक स्तर पर आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त हैं।
विशेष रूप से, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन लगातार अपनी गतिविधियों का विस्तार कर रहे हैं। इन समूहों के खिलाफ पाकिस्तान की कार्रवाई की कमी अमेरिका और अन्य देशों के लिए चिंता का विषय है। इस प्रकार के संगठनों को पाकिस्तान में सुरक्षित आश्रय प्राप्त है, जिससे उनकी गतिविधियाँ बढ़ती हैं और प्रभावित देशों में सुरक्षा चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मानना है कि पाकिस्तान को स्पष्ट और निर्णायक कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि वह आतंकवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता को साबित कर सके। इसके अलावा, पाकिस्तान के कुछ अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में जटिलताएँ, जैसे कि सैनिक साम्यवादी देश चीन के कर्ज में दबा होना और भारत में आतंकवाद को मदद देना, उत्पन्न हो चुकी हैं। ये समस्याएँ न केवल क्षेत्र में समय-समय पर चुनौती देती हैं, बल्कि पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी बाधित करती हैं।
इन सभी चिंताओं के परिणामस्वरूप, पाकिस्तान की भूमिका बढ़ते वैश्विक आतंकवाद और उनकी सहायता के संदर्भ में महत्वपूर्ण बन गई है।
पाकिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ रणनीति
भविष्य में आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने के लिए एक बहुआयामी रणनीति को विकसित करने की आवश्यकता है। ईरान की तरह ही, अमेरिका और इस्राइल को यह सुनिश्चित करने के लिए कि पाकिस्तान जैसे देशों में आतंकवाद की जड़ें कमजोर हों, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एकजुट कर स्पष्ट और समन्वित प्रयास करने की आवश्यकता है।
अब पाकिस्तान में यह आवश्यक है कि विकास और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जाए तथा देश के भीतर आर्थिक अवसरों की वृद्धि और शिक्षा के स्तर में सुधार से युवाओं को निरंकुशता और कट्टरपंथी विचारधाराओं की ओर जाने से रोका जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठनों को परिवर्तनों की दिशा में कार्यरत स्थानीय संस्थाओं के साथ सहयोग करना चाहिए, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां आतंकवाद का प्रभाव सबसे अधिक है।
वैश्विक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका और इस्राइल को पाकिस्तान सरकार और अन्य क्षेत्रीय नेताओं के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि वह आतंकवाद के प्रति दृष्टिकोण को बदलने की दिशा में ठोस संवाद स्थापित कर सके और भविष्य में लीबिया, लेबनान, सीरिया या ईरान की तरह की घटनाओं से बचा जा सके।

