ग्लेशियर (Glacier), जिसे हिंदी में हिमनद या हिमानी भी कहते हैं, बर्फ का एक विशाल और गतिशील भंडार होता है। यह उन क्षेत्रों में बनता है जहाँ साल भर गिरने वाली बर्फ की मात्रा उसके पिघलने की मात्रा से अधिक होती है। इनको ‘बर्फ की नदियाँ’ (Rivers of Ice) भी कहा जाता है क्योंकि ये बहुत धीमी गति से बहते हैं।
पूरी दुनिया में जब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से इनके के पिघलने और सिकुड़ने की खबरें आ रही हैं, वहीं वैज्ञानिकों ने एक बिल्कुल अलग और बेहद डरावनी चेतावनी दी है. ‘यूनिवर्सिटी ऑफ पोर्ट्समाउथ’ के नेतृत्व में हुए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में 3,100 ऐसे ‘सर्जिंग ग्लेशियर’ की पहचान की गई है, जो शांत रहने के बजाय अचानक ‘पागल’ हो जाते हैं.
ये ग्लेशियर सालों तक बर्फ जमा करते हैं और फिर अचानक उसे तेजी से आगे की ओर धकेल देते हैं. इनकी यह रफ्तार तबाही का वो मंजर ला सकती है, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है.
भारत में ग्लेशियर
यह हिमनद जमीन पर जमी बर्फ की एक स्थायी और मोटी परत होती है जो अपने ही वजन और गुरुत्वाकर्षण के कारण धीरे-धीरे नीचे की ओर दबती या खिसकती है।
ताजी बर्फ जमा होते होते, समय के साथ दबकर सघन (dense) हो जाती है और अंततः सख्त बर्फ में बदल जाती है।
दुनिया में ग्लेशियर (Glacier) मीठे पानी (fresh water) के सबसे बड़े स्रोत और भंडार हैं।
भारत में बहने वाली विशाल एवं पवित्र नदी, गंगा और यमुना जैसी कई प्रमुख नदियाँ ग्लेशियरों के पिघलने से ही निकलती हैं।
ग्लेशियर पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत में मुख्य रूप से हिमालय और काराकोरम पर्वतमालाओं में हजारों ग्लेशियर (हिमनद) पाए जाते हैं।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में लगभग 9,575 ग्लेशियर हैं। और यह उत्तर भारत की प्रमुख नदियों जैसे गंगा, यमुना, सिंधु और ब्रह्मपुत्र के लिए पानी का मुख्य स्रोत हैं।
भारत के महत्वपूर्ण हिमनद
- हिमालय की काराकोरम रेंज (लद्दाख) में स्थित सियाचिन ग्लेशियर (Siachen Glacier) भारत का सबसे बड़ा ग्लेशियर है, जिसकी लंबाई लगभग 76 किमी है।
- उत्तराखंड के उत्तरकाशी में स्थित यह गंगोत्री ग्लेशियर (Gangotri Glacier) गंगा नदी (भागीरथी) का उद्गम स्थल है।
- बड़ा शिगड़ी (Bara Shigri): यह हिमाचल प्रदेश के लाहौल और स्पीति जिले में स्थित राज्य का सबसे बड़ा ग्लेशियर है, जो चिनाब नदी के जल का स्रोत है।
- सिक्किम में कंचनजंगा की तलहटी में, पूर्वी हिमालय रेंज के सबसे बड़े ग्लेशियर का नाम, ज़ेमू (Zemu Glacier) है।
- उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में पिंडारी ग्लेशियर (Pindari Glacier) है. जो, ट्रेकर्स के बीच बहुत लोकप्रिय है।
- यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में मिलम ग्लेशियर (Milam Glacier) भी ट्रेकर्स के बीच लोकप्रिय है।
सर्जिंग ग्लेशियर
आम ग्लेशियर बहुत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं, लेकिन सर्जिंग ग्लेशियर का व्यवहार बहुत अलग होता है. वैसे तो सामान्य रूप से यह बहुत सुस्त होते हैं, पर अचानक अपनी रफ्तार कई गुना बढ़ा देते हैं।
इस दौरान भारी मात्रा में बर्फ इनके अगले हिस्से की ओर बढ़ती है, जिससे यह पूरा हिमनद अचानक आगे बढ़ जाता है.
यह दुनिया में तकरीबन 1% हैं, लेकिन ये कुल ग्लेशियर क्षेत्र का लगभग 20% कवर करते हैं.
हिमनद से खतरे
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जब ये हिमनद अपनी सीमाओं को लांघते हैं, तो ये कई तरह की तबाही ला सकते हैं. जैसे,
- ये हिमनद अचानक से आगे बढ़कर इमारतों, सड़कों और खेतों को बर्फ के नीचे दबा सकते हैं.
- ये हिमनद बढ़कर नदियों का रास्ता रोक देते हैं, जिससे अस्थायी झीलें बन जाती हैं. जब ये झीलें टूटती हैं, तो निचले इलाकों में प्रलयंकारी बाढ़ आती है.
- इनका अचानक टूटना या खिसकना पहाड़ों पर बर्फ और मलबे का भयंकर तूफान लाता है.
- ग्लेशियर के नीचे जमा पानी का बिना किसी चेतावनी के अचानक से बाहर निकलना बाढ़ ला सकता है.
- तेज रफ्तार की वजह से ग्लेशियर में गहरी और चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे पर्वतारोहियों और पर्यटकों के लिए वहां जाना जानलेवा हो जाता है.
- जब ये ग्लेशियर समुद्र में गिरते हैं, तो भारी संख्या में ‘आइसबर्ग’ बनते हैं, जो जहाजों के लिए बड़ा खतरा हैं.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जलवायु परिवर्तन ने इन ग्लेशियरों के व्यवहार को पूरी तरह अनिश्चित बना दिया है. भारी बारिश या बहुत ज्यादा गर्मी इन ग्लेशियरों को वक्त से पहले ‘सर्ज’ करने के लिए उकसा रही है.
वैज्ञानिकों ने 81 सबसे खतरनाक ग्लेशियरों की पहचान की है, जिनमें से अधिकतर कराकोरम पहाड़ियों में हैं. यहां इनके ठीक नीचे आबादी और अहम इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद हैं. दुनिया के कुछ हिस्सों में ये सर्ज बढ़ रहे हैं, तो आइसलैंड जैसी जगहों में ये धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं.
ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते तापमान के कारण दुनिया भर के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे समुद्र के जल स्तर में वृद्धि और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा भी बढ़ गया है
वैज्ञानिकों का कहना है कि अब पुराने तरीके से ग्लेशियर (Glacier) के बारे में अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है. मौसम परिवर्तन का भी कोई निश्चित ट्रेंड (नियम या प्रकार) भी नही है. जिस तरह मौसम बदल रहा है, उसे देखते हुए दुनियाभर के इन पर सैटेलाइट और ग्राउंड लेवल से 24 घंटे नजर रखना जरूरी हो गया है।

