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Anang Trayodashi: अनंग त्रयोदशी पूजा का क्या महत्व है?

अनंग त्रयोदशी (Anang Trayodashi) हिंदू कैलेंडर में चैत्र शुक्ल या मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष के तेरहवें दिन मनाया जाने वाला एक त्योहार है।

अनंग त्रयोदशी, भगवान शिव की पूजा को समर्पित एक पवित्र दिन है। इस दिन शिव योग का निर्माण होने से यह और भी अधिक शुभ माना जाता है।

अनंग त्रयोदशी (Anang Trayodashi) भगवान शिव के सम्मान में या उनकी कृपा के लिए मनाया जाने वाला व्रत है। यह व्रत चैत्र मास की शुक्ल पक्ष त्रयोदशी (Shukla Paksha Trayodashi) को मनाया जाता है। आमतौर पर यह पर्व  गुजरात और महाराष्ट्र में मनाई जाती है। उत्तर भारत में अनंग त्रयोदशी मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी (Margashirsha Shukla Trayodashi) को मनाई जाती है।

अनंग त्रयोदशी (Anang Trayodashi) को पूजा-पाठ, आध्यात्मिक विकास और ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए बहुत शुभ माना जाता है। अनंग त्रयोदशी पर व्रत रखने और अनुष्ठान करने से आंतरिक शक्ति मिलती है, मन और आत्मा शुद्ध होती है और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा मिलती है।

अनंग त्रयोदशी (Anang Trayodashi)

अनंग त्रयोदशी (Anang Trayodashi) हर वर्ष मार्गशीर्ष माह (Margashirsha Maas) के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है।

मार्गशीर्ष माह (Margashirsha Maas) हिंदू पंचांग का नौवां महीना है इसे अग्रहायण या अगहन का महीना भी कहते हैं.

मार्गशीर्ष माह हिंदू शास्त्रों में सर्वाधिक पवित्र महीना माना जाता है तथा ऐसा माना जाता हैं कि, इसी महीने से सतयुग का आरंभ हुआ था।

इस दिन शिव परिवार की पूजा से वैवाहिक जीवन में शांति आती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती, कामदेव और रति की पूजा करने से प्रेम संबंधों में गहराई आती है। और दांपत्य जीवन में सामंजस्य बना रहता है।

अनंग त्रयोदशी (Anang Trayodashi) के दिन अनंग देव का पूजन होता है और अनंग का दूसरा नाम कामदेव है। इस दिन भगवान शिव का पूजन बहुत ही बड़े पैमाने पर संपन्न होता है। अनंग त्रयोदशी का उपवास दाम्पत्य में प्रेम की वृद्धि करता है और गृहस्थ जीवन का सुख व संतान का सुख प्राप्त होता है। पुराणों में भी दिन की महत्ता को दर्शाया गया है, इस दिन अनंग देव का पूजन करने से भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है।

सृष्टि में प्रेम का महत्व

सनातन धर्म में सोलह संस्कारों का वर्णन है। इनमें एक संस्कार विवाह (Vivah) है। इस संस्कार के तहत विद्या अध्ययन के बाद, जब जातक परिवार का सुचारु रूप से संचालन करने हेतु धन उपार्जन करने लगता है तो विवाह किया जाता है।

इसमें वर और कन्या दोनों पक्षों की सहमति रहती है। शास्त्रों में कई प्रकार के विवाह (Vivah) का वर्णन है। इनमें सबसे उत्तम प्रकार का विवाह (Vivah), वर एवं वधू पक्ष के द्वारा निश्चित किया गया विवाह है। इसके अलावा, एक और विवाह प्रेम विवाह है जिसमें जातक (पुरुष और कन्या) आपस में प्रेम से वशीभूत होकर विवाह करते हैं।

सृष्टि के संरचना में प्रेम को सबसे महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है, वैसे तो प्रेम के कई रूप और प्रकार हैं, लेकिन यहाँ हम बात करते है स्त्री और पुरुष के मध्य होने वाले प्रेम की, जिसके मूल में सृजन है। सृजन के लिए प्रेम आवश्यक है और इस प्रेम के देवता कामदेव (god of love kamadeva) हैं और प्रेम की देवी रति (Goddess of love Rati) हैं। कामदेव (kamadeva) व्यक्ति में आकर्षण का संचार करते हैं। इस वजह से स्त्री और पुरुष में एक दूसरे के प्रति आकर्षण पैदा होता है। आइए, कामदेव (kamadeva) की पौराणिक कथा के संबंध में जानते हैं:

कामदेव की कथा

शास्त्रों में कामदेव (kamadeva) की उत्पत्ति या जन्म को लेकर कई प्रसंग हैं। जानकारों में भी मतभेद हैं। कई प्रकांड पंडित इन्हें भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी का पुत्र बताते हैं। वहीं, कई पंडित इन्हें ब्रह्मा जी की संतान बताते हैं। किदवंती है कि एक बार जब भगवान शिवजी माता सती के वियोग में थे तब उन्हें ब्रह्मांड से लगाव न रहा आर देवों के देव महादेव तपस्या में लीन हो गए। भगवान शिव को संहारक माना जाता है, उनके तपस्या में लीन होते ही तीनों लोकों में असुरों का आतंक बढ़ गया।

इस समस्या के उपाय के लिए देवी-देवताओं ने भगवान शिव के ध्यान को भंग करने की जिम्मेवारी कामदेव को सौंपी। जब कामदेव ने कान के मार्ग से शिव जी के शरीर में प्रवेश किया, तो शिव जी को ज्ञात हो गया। उन्होंने तत्काल कामदेव को बाहर निकलने का आदेश दिया। यह सुन कामदेव शिवजी के शरीर से निकलकर बाहर आ गए, लेकिन शिवजी ने क्रोध में अपना त्रिनेत्र खोल दिया, इससे कामदेव जलकर भस्म हो गए। यह देखकर रति रोने लगी।

कुछ समय पश्चात, जब शिवजी का क्रोध कम हुआ, तो उन्होंने कहा कि कामदेव को कहा की उनको अनंग रूप में शिवलिंग की पूजा-उपासना करनी होगी। इसके बाद ही इन्हें सजीव रूप मिल जाएगा और द्वापर युग में कामदेव का जन्म भगवान कृष्णजी के घर माता रुक्मणि के गर्भ से होगा।

अनंग का एक अन्य नाम कामदेव हैं, अनंग अर्थात बिना अंग के, जब भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया तो रति द्वारा अनंग को जीवत करने का करुण वंदन सुन भगवान ने कामदेव को पुन: जीवन प्रदान किया। किंतु बिना देह के होने के कारण कामदेव का एक अन्य नाम अनंग कहलाया है

इस प्रकार वरदान पाकर कामदेव ने महादेव की आराधना की और द्वापर युग में कामदेव को सजीव रूप मिला।
इसलिए अनग त्रियोदशी को भगवान शिव की शिवलिंग रूप में पूजा को पारिवारिक सुख में महत्वपूर्ण माना गया है

अनंग त्रयोदशी (Anang Trayodashi) का व्रत एवं शिवलिंग का पूजन, स्त्री व पुरूष सभी किए लिए होता है, जो भी व्यक्ति जीवन में प्रेम से वंचित है उसके लिए यह व्रत अत्यंत ही शुभदायक होता है। अनंग त्रयोदशी (Anang Trayodashi) भगवान शंकर द्वारा अनंग को दिये गए वरदान स्वरुप यह दिवस अत्यंत ही महत्वपूर्ण हो जाता है।

अनंग त्रयोदशी पूजा (Anang Trayodashi Pooja)

अनंग का एक अन्य नाम कामदेव हैं, अनंग अर्थात बिना अंग के, जब भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया तो रति द्वारा अनंग को जीवत करने का करुण वंदन सुन भगवान ने कामदेव को पुन: जीवन प्रदान किया। किंतु बिना देह के होने के कारण कामदेव का एक अन्य नाम अनंग कहलाया है

अनंग त्रयोदशी के अवसर पर भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करने के बाद कामदेव और उनकी पत्नी देवी रति की पूजा की जाती है। कामदेव की पूजा में सुगंधित फूल, इत्र, चंदन, फल और मिठाइयां अर्पित करते हुए सुखद दांपत्य जीवन की कामना करनी चाहिए।

कामदेव को प्रसन्न करने के लिए उनके मंत्र ‘ॐ कामदेवाय: विदमहे पुष्पबाणाय धीमहि तन्नो अनंग: प्रचोदयात’ का स्फटिक की माला से जाप करना चाहिए। इस पूजन द्वारा सौभाग्य, सुख ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है वैवाहिक संबंधों में सुधार होता है और प्रेम संबंध मजबूत होते हैं। इस दिन कामदेव और रति का भी पूजन होता है और इस त्रयोदशी का व्रत करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। अनंग त्रयोदशी का पर्व महाराष्ट्र और गुजरात में बहुत व्यापक स्तर में मनाया जाता है।

दिसंबर माह में आने वाली अनंग त्रयोदशी को मुख्य रूप से उत्तर भारत में बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। अनंग त्रयोदशी के दिन सर्वप्रथम सुबह स्नान करना चाहिए और साफ कपड़े पहनने चाहिये। भगवान शिव का नाम जाप करना चाहिए। भगवान शिव को सफेद रंग की वस्तुएं अर्पित करनी चाहिये। इसमें सफेद वस्त्र, मिठाई, बेलपत्र को चढ़ाना चाहिये।

इस पूजन में तेरह की संख्या में वस्तु भी भेंट कर सकते हैं जिसमें तेरह सिक्के, बेलपत्र, लडडू, बताशे इत्यादि। पूजा में अशोक वृक्ष के पत्ते और फूल चढ़ाना बहुत शुभ होता है। साथ ही घी के दीपक को अशोक वृक्ष के समीप जलाना चाहिये। इस मंत्र का जाप करना चाहिये – “नमो रामाय कामाय कामदेवस्य मूर्तये। ब्रह्मविष्णुशिवेन्द्राणां नम: क्षेमकराय वै।।”

अनंग त्रयोदशी व्रत की पौराणिक कथा

पुराणों में अनंग त्रयोदशी से जुड़ी कथा का वर्णन किया गया है, इस कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती के द्वारा अग्निवरण कर लेने के बाद, भगवान शिव बहुत व्यथित होते हैं। वह सती के शव को अपने कंधे पर उठा कर चल पड़ते हैं। ऐसे में सृष्टि के संचालन पर अवरोध दिखाई पड़ने लगता है और विनाशकारी शक्तियां प्रबल होने गती हैं। भगवान शिव पर से सती के भ्रम को खत्म करने के लिए, भगवान विष्णु ने उसके शव को खंडित कर दिया और तब, भगवान शिव ध्यान में लग गए।

उन्ही दिनों में दानव तारकासुर के अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे थे। उसने देवलोक पर आक्रमण किया और देवराज इंद्र को पराजित कर दिया। सभी देवता-गण परेशान थे। इंद्र का राज्य छिन जाने पर वह देवताओं समेत मदद के लिए भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे। भगवान ब्रह्मा ने इस पर विचार किया और कहा कि केवल भगवान शिव का पुत्र ही तारकासुर का वध कर सकता है। यह सुनकर सभी चिंतित हो गए क्योंकि भगवान शिव सती से अलग होने के शोक में ध्यान कर रहे थे। भगवान शिव को जगाना और उनका विवाह करवाना सभी देवताओं के लिए असंभव था। तब सभी देवताओं की आज्ञा से, कामदेव ने भगवान शिव को ध्यान समाधि से जगाने का फैसला किया। कामदेव सफल हुए और भगवान शिव की समाधि टूट गई। बदले में, कामदेव ने अपना शरीर खो दिया। क्योंकि भगवान के तीसरे नेत्र के खुलते ही कामदेव का शरीर भस्म हो गया। जब सभी ने भगवान शिव को तारकासुर के बारे में बताया, तो उनका गुस्सा कम हो गया ।

भगवान शिव ने शोकाकुल कामदेव की भार्या, रति को बताया कि कामदेव अभी भी जीवित हैं लेकिन, शरीर रुप में नहीं है। भगवान शिव ने उसे त्रयोदशी तक प्रतीक्षा करने को कहा। उन्होंने कहा, जब विष्णु कृष्ण के रूप में जन्म लेंगे, तब कामदेव, कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेंगे. इस प्रकार कामदेव को पुन: जीवन प्राप्त होता है।

 

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