सम्पाती एक विशाल और शक्तिशाली गिद्ध (गरुड़वंशी पक्षी) थे। वे रामायण में वर्णित गिद्धराज जटायु के बड़े भाई थे। दोनों ही दिव्य वंश से संबंधित हैं और सूर्यदेव के सारथी अरुण के पुत्र माने जाते हैं।
ऊंचे आकाश में उड़ने वाले पराक्रमी गिद्ध भाई, सम्पाती और जटायु अत्यंत शक्तिशाली, तेज और साहसी थे। बचपन से ही उनमें अद्भुत प्रेम था, लेकिन साथ ही एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी रहती थी।
सूर्य तक उड़ने की चुनौती
एक दिन दोनों भाइयों के मन में विचार आया कि, क्यों न देखा जाए कि कौन अधिक ऊँचा उड़ सकता है? यह सोचकर दोनों आकाश में उड़ चले।
जैसे-जैसे वे ऊपर जाते गए, सूरज की तपिश बढ़ती गई। जटायु, जो छोटे भाई थे, जोश में आकर बहुत ऊपर तक उड़ गए। लेकिन धीरे-धीरे सूर्य की प्रचंड गर्मी उन्हें सहन नहीं हुई और उनके पंख जलने लगे।
बड़े भाई सम्पाती ने देखा कि जटायु संकट में हैं। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपने विशाल पंख फैलाकर जटायु को ढक लिया, ताकि सूर्य की गर्मी उनसे दूर रहे।
इस त्याग का परिणाम यह हुआ कि जटायु तो बच गए, लेकिन सम्पाती के अपने पंख और शरीर बुरी तरह जल गए। वे अपनी उड़ने की शक्ति खो बैठे और पृथ्वी पर गिर पड़े।
उस दिन के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया।
अब सम्पाती उड़ नहीं सकते थे। वे समुद्र के किनारे रहने लगे। एक समय के महान और शक्तिशाली गिद्ध थे, लेकिन अब असहाय और निर्बल हो गए थे।
वहीं दूसरी ओर, इस घटना से जटायु बहुत दुखी हुए और उन्होंने अपने भाई के बलिदान को ध्यान में रखकर संकल्प लिया कि वे हमेशा धर्म और सत्य के मार्ग पर चलेंगे।
सीता हरण और जटायु का साहस
समय बीता और एक दिन लंका का राक्षस राजा रावण माता सीता का हरण करके उन्हें अपने रथ में बैठाकर आकाश मार्ग से ले जा रहा था।
जब जटायु ने यह देखा तो तुरंत ही रावण को रोकने का प्रयास किया और अकेले ही रावण से युद्ध किया। दोनों के बीच अत्यंत भीषण युद्ध हुआ।
पक्षीराज जटायु ने अपनी पूरी शक्ति के साथ परम शक्तिशाली रावण के साथ युद्ध किया, अंततः रावण ने जटायु के पंख काट दिए, जिससे वे घायल होकर धरती पर गिर पड़े। लेकिन अंत तक धर्म का साथ नहीं छोड़ा और जब तक प्रभु श्रीराम के दूतों को माता सीता के हरण की सारी सूचना नही दी, घायल अवस्था में ही जीवन जीते रहे और सीता माता की खोज में निकले वानरों से भेंट के उपरांत जटायु ने प्राणों का त्याग किया था.
जब हनुमान और उनके साथी वानर सीता जी की खोज करते दक्षिण दिशा में समुद्र किनारे पहुँचे तभी उनकी मुलाकात पक्षीराज जटायु के भाई सम्पाती से हुई। उनसे मिलकर सीता माता की खोज और उनके भाई जटायु के संबंध में सारा व्रतांत सुनाया।
तब सम्पाती ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर बताया कि सीता माता लंका में हैं। यह सुनकर हनुमान जी और उनके साथी वानरों को नया उत्साह मिला।
कहा जाता है कि, सम्पाती के पुण्यकर्मों और भगवान की भक्ति से, तो उनके जले हुए पंख धीरे-धीरे ठीक हो गए इसके बाद उन्होंने शांतिपूर्वक जीवन बिताया और अंततः प्राकृतिक मृत्यु को प्राप्त हुए।

