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‘पंच परिवर्तन’ से सशक्त भारत का पुनर्निर्माण: आरएसएस का संकल्प

‘पंच परिवर्तन’ केवल विचार नहीं, राष्ट्र निर्माण का आचरण है।” : प.पू सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS)

‘पंच परिवर्तन’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा समाज में सकारात्मक बदलाव और राष्ट्र निर्माण के लिए प्रस्तावित पाँच प्रमुख सामाजिक आचरण-परक सुधार हैं, जो सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, स्व-बोध और नागरिक कर्तव्यों पर केंद्रित हैं। यह आंदोलन विकसित भारत के लिए आत्म-अनुशासन और पारिवारिक मूल्यों को पुनः स्थापित करने पर जोर देता है।

‘पंच परिवर्तन’ क्या हैं?

  • सामाजिक समरसता: जाति और वर्ग भेद को मिटाकर सभी को समान मानना, तथा मंदिर, पानी और श्मशान साझा करना।
  • कुटुंब प्रबोधन: परिवार में संस्कार बढ़ाना, नियमित संवाद और संयुक्त परिवार के मूल्यों को जीवित रखना।
  • पर्यावरण संरक्षण: प्लास्टिक-मुक्त जीवन, जल संरक्षण और वृक्षारोपण को अपनाना।
  • स्व-बोध और स्वदेशी: अपनी भाषा, वेशभूषा, भोजन और संस्कृति पर गर्व करना तथा स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करना।
  • नागरिक कर्तव्य: नियमों और कानून का पालन करना, स्वच्छता, और अनुशासन बनाए रखना।
Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) Panch Parivartan 'पंच परिवर्तन'; Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) का 'पंच परिवर्तन' आवाहन और संकल्प
Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) Panch Parivartan ‘पंच परिवर्तन’; Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) का ‘पंच परिवर्तन’ आवाहन और संकल्प

हिन्दू एकता का विचार और राष्ट्र के पुनरुत्थान तथा प्राचीन भारत के गौरव को वापस स्थापित करने के भाव को लेकर वर्ष १९२५ में महाराष्ट्र के नागपूर में पूज्य डॉ. हेडगेवार के प्रयास से आरंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) विश्व भर में कार्यरत हैं । यह संगठन अपने एक शताब्दी वर्ष में पूरा कर चुका है। प्राकृतिक हो या मानवजनित आपदा, सामाजिक उत्थान, अंत्योदय (अर्थात समाज के ‘अंतिम व्यक्ति का उदय’ या सबसे गरीब और समाज की मुख्यधारा से वंचित व्यक्ति का विकास) कार्यों में राष्ट्र प्रथम का भाव लेकर सभी को समान रूप से सहयोग प्रदान करता रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए गत 100 वर्षों से लगातार काम कर रहा है। इसी दिशा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय समाज में व्याप्त असमानता को दूर करने, राष्ट्रीय एकता और नागरिक कर्तव्यों के साथ साथ व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन के भाव को बढ़ाने के उद्देश्य से पूज्य सर संघचालक जी ने पंच परिवर्तन का आह्वान किया जिससे कि युवा वर्ग स्वस्थ, अनुशासित और राष्ट्रवाद की भावना वाले समाज निर्माण की दिशा में कार्य करें।

इस पंच परिवर्तन में पांच आयाम शामिल किए गए हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि पंच परिवर्तन के इस आंदोलन को सुचारू रूप से लागू कर समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। स्व के बोध से नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होंगे। नागरिक कर्तव्य बोध अर्थात नियम और कानून के पालन से राष्ट्र समृद्ध व उन्नत होगा। सामाजिक समरसता व सद्भाव से ऊंच-नीच जाति भेद समाप्त होंगे। पर्यावरण के संरक्षण से जीवन के लिए आवश्यक प्राकृतिक स्रोतों के क्षरण को रूका जा सकेगा। पारिवारिक मूल्यों के लिए, कुटुम्ब प्रबोधन के द्वारा परिवार संगठित होंगे और संस्कृति तथा संस्कार पुनः स्थापित होंगे, आपसी प्रेम और सद्भावना में बढ़ेगी होगी। न्यायालय में पारिवारिक, पास- पड़ोस या अन्य संस्कार संबंधित मुकदमे का प्रतिशत अन्य की अपेक्षा अधिक देखा गया है, जिसको कुटुम्ब प्रबोधन द्वारा समाप्त किया जा सकता है।

अखंड भारत का अंग्रेजों द्वारा बँटवारा
अखंड भारत का अंग्रेजों द्वारा बँटवारा

इन सभी भावनाओं से प्रतीत होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज राष्टीय भावनाओं के साथ ही पर्यावरण और सबसे छोटी सामाजिक इकाई, परिवार तक पहुँचने के लिए कटिबद्ध है। और ये पांच परिवर्तन आगामी वर्षों में भारतीय समाज को उत्कृष्ट बनाने में महत्वपूर्ण दिशा देने वाले हैं।

सामाजिक समरसता:

पंच परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण घटक है ‘सामाजिक समरसता’ जिसका अर्थ समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सौहार्द और प्रेम बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना है। हिन्दू धर्म के प्रमुख शस्त्रों में से एक उपनिषदों के अनुसार, ब्रह्म (ब्रह्मा जी) ने अपने संकल्प से सृष्टि की रचना की थी. ब्रह्म (ब्रह्मा जी) ने सृष्टि निर्माण के लिए विचार किया कि, ‘एकोहं बहुस्याम’ का तात्पर्य है, कि ‘मैं एक हूँ, और मैं अनेक हो जाऊँ’ और इस तरह से उसने स्वयं को कई रूपों में विभक्त कर लिया. जो आज उसी स्वरूप में सभी जीवों के अंदर व्याप्त है, जिसे हम आत्मा (या प्राण) भी कहते हैं।

सामाजिक समरसता का मूल स्थापित करने के लिए जातिगत भेदभाव और उंच-नीच, छुआ-छूत को समाप्त करना ही होगा. समाज के सभी लोगों को मनुष्य मात्र की दृष्टि से देखकर, पद, धन, जाति, वर्ण रंग, भाषा का भेद न करते हुए, समरसता, सद्भावना स्थापित करनी होगी। क्योंकि हम सभी ब्रह्म की एक ही संकल्पना है।

समाज के प्रत्येक व्यक्ति ( या वंचित अंतिम व्यक्ति) सभी को आत्मवत समझना ही सामाजिक समरसता है और इससे ही सभ्य समाज का निर्माण संभव है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि में सामाजिक समरसता के लिए लोगों में आपसी प्रेम और सद्भाव आवश्यक है तथा इसके लिए जनमानस में जागरूकता की आवश्यकता है।

कुटुम्ब प्रबोधन:

केवल खुशहाल और स्वस्थ परिवार से ही शांतिपूर्ण और समृद्ध समाज का निर्माण हो सकता है और समृद्ध समाज से एक साधन सम्पन्न, विकसित और शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण संभव है।

परिवार को राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इकाई के रूप में परिष्कृत करना वर्तमान समय की आवश्यता है। सांस्कृतिक रूप से, परिवारों को संस्कृति के संरक्षण और प्रसार का माध्यम माना जाता है। इसलिए प्राचीन समय से ही भारत में परिवार को समाज की मूल इकाई के रूप में देखा जाता है। सदियों से भारतीय पारिवारिक और वैवाहिक जीवन की प्रणाली समाज, प्रकृति, पर्यावरण, जीवन में कर्तव्य और ब्रह्मांड के साथ जुड़ी हुई थी। “सभी के लिए एक, और एक के लिए सभी” पर आधारित यह व्यवस्था परिवारों में “सहभागिता” और “स्व-बोध” करने के कारण सफलता का सूत्र कही जाति है।

Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) Panch Parivartan 'पंच परिवर्तन'; Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) का 'पंच परिवर्तन' आवाहन और संकल्प
Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS)

 

भारतीय दर्शन में पारिवारिक संस्कृति

सनातन धर्म के अनुसार, मानव जीवन को 100 वर्ष की संभावित आयु मानकर उसे चार मुख्य आश्रमों (चरणों) में विभाजित किया गया है, जिनका उद्देश्य शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति है। ये चार आश्रम हैं: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। इस दर्शन का मूल चार पुरुषार्थों, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अवधारणा पर आधारित है प्रत्येक आश्रम का पालन करना जीवन को अनुशासित और सफल बनाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

मानव जीवन के चार आश्रम:

1. ब्रह्मचर्य आश्रम (0-25 वर्ष): यह शिक्षा काल माना गया है और यह शिक्षा, ज्ञान प्राप्ति, संयम और चरित्र निर्माण का चरण है।
2. गृहस्थ आश्रम (25-50 वर्ष): विवाह के बाद परिवार, समाज और धर्म के प्रति जिम्मेदारियों को निभाने का चरण है। इसे अन्य आश्रमों का आधार भी माना जाता है।
3. वानप्रस्थ आश्रम (50-75 वर्ष): सांसारिक मोह-माया से धीरे-धीरे विरक्ति लेकर, सामाजिक दायित्वों से मुक्त होकर ईश्वर की ओर अग्रसर होने की अवस्था।
4. संन्यास आश्रम (75-100 वर्ष): पूर्ण त्याग, वैराग्य और परमात्मा की भक्ति में लीन होकर मोक्ष प्राप्ति का अंतिम चरण।

सनातन परंपरा और वैदिक मान्यताओं के अनुसार, हर मनुष्य जन्म के साथ तीन मुख्य ऋण (पितृ ऋण, ऋषि ऋण, और देव ऋण) लेकर आता है, जिन्हें जीवन में कर्मों द्वारा चुकाना आवश्यक माना जाता है। इसके अलावा, कुछ ग्रंथों में चार (ब्रह्म ऋण सहित) या पांच ऋण (भूत ऋण और अतिथि ऋण सहित) का उल्लेख भी मिलता है।

मनुष्य के मुख्य तीन ऋण:

• पितृ ऋण (Parents’ Debt): माता-पिता और पूर्वजों के प्रति कर्तव्य। यह संतान उत्पन्न करके तथा माता-पिता और पूर्वजों की सेवा करके चुकाया जाता है।
• ऋषि ऋण (Guru’s Debt): ज्ञान देने वाले शिक्षकों, ऋषियों/गुरुओं के प्रति ऋण। यह वेदों, शिक्षाओं का अध्ययन करने और ज्ञान का प्रसार करने से पूरा होता है।
• देव ऋण (Divine Debt): प्रकृति और देवताओं के प्रति ऋण (सूर्य, जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश आदि)। यह यज्ञ, दान, पूजा और प्रकृति की सेवा द्वारा चुकाया जाता है।

सनातन धर्म की कई मान्यताओं में ब्रह्म ऋण (ईश्वर/सृष्टि के प्रति भक्ति, जप, तप ) को भी चौथा मुख्य ऋण माना गया है, जिसे ईश्वर भक्ति, आत्मा की पवित्रता, धर्मग्रंथों के पठन-पाठन और प्रसार से चुकाया जाता है।

पर्यावरण संरक्षण:

भारतीय संस्कृति में जन्म भूमि को माता माना जाता है और कहा गया है कि, “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गाऽदपि गरियसी”। प्राचीन शस्त्रों, ग्रंथों वेद और पुराणों में पृथ्वी को माता का स्थान दिया गया है. अथर्ववेद कहा गया है, “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” अर्थात ‘धरती हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं’.
इस प्रकार पृथ्वी को माता मानकर प्रकति और पर्यावरण संरक्षण हेतु असामान्य जीवनशैली में बदलाव करना और इसके लिए सकल समाज में प्रचार करना, जीवन के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों को क्षरण से रोकना सभी नागरिकों का मौलिक दायित्व होना चाहिए।

Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) Panch Parivartan 'पंच परिवर्तन'; Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) का 'पंच परिवर्तन' आवाहन और संकल्प
Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) Panch Parivartan ‘पंच परिवर्तन’; Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) का ‘पंच परिवर्तन’ आवाहन और संकल्प

स्वदेशी और आत्मनिर्भरता:

नागरिक कर्तव्य और स्व-बोध के साथ अधिकतम स्वदेशी संसाधन का उपयोग कर निर्माण आधारित अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने की जरूरत है। आत्मनिर्भर भारत का आशय केवल आयात कम करना ही नहीं, वल्कि क्षमता, रचनात्मकता और कौशल को भी बढ़ाना होगा। इसमें “मेक इन इण्डिया” के साथ साथ “मेक फॉर वर्ल्ड” की व्यापक संकल्पना के साथ आगे बढ़ना होगा।

स्वदेशी सिर्फ शब्द नही, यह आत्मनिर्भरता और स्वावलम्बन का सचूक भी है इसका तात्पर्य स्वदेशी वस्तु, स्वदेशी (राष्ट्र प्रथम) शासन व्यवस्था और कानून की स्थापना और पालन से है। इसे संघ पुनः मंत्र रूप में लेकर ‘स्वदेशी जागरण मंच’ के माध्यम से जन जन तक पहुँचने को संकल्पित है।
स्वामी विवेकानन्द ने विदेशों में भारतीय संस्कृति की महानता को, धर्म के विदेशी स्वरूप को स्पष्ट और तार्किक रूप में रखा। जिससे कि भारतीयों में अपने धर्म, संस्कृति व देश को लेकर ‘आत्मसम्मान’ की भावना विकसित और समद्धृ हुई। आज पुनः समाज को उसी दिशा की तरफ उन्मुख करने का प्रयत्न करना है ।

नागरिक कर्तव्य:

भारत में रहनेवाले प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य और धर्म है कि समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर उन्नत समाज का निर्माण कर राष्ट्रहित में योगदान दें। नागरिक कर्तव्य, नागरिकों की ज़िम्मेदारियां और अधिकार होते हैं. आज के संदर्भ में संवैधानिक कर्तव्यों में प्रमुख रूप से जरूरी पालन करने वाले और संविधान में वर्णित हैं:

  • संविधान का सम्मान और उसके नियमों का पालन करना।
  • राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और राष्ट्रध्वज का सम्मान करना।
  • राष्ट्रीय और समाज सेवा के साथ साथ सुरक्षा के लिए तत्पर रहना।
  • देश की एकता, अखंडता, और संप्रभुता को बनाए रखने के लिए संकल्पबद्ध होना।
  • धर्म, भाषा, और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव को खत्म करना।
  • पर्यावरण की रक्षा, प्राणियों के प्रति दया का भाव सदैव रखना।
  • विकसित और वैज्ञानिक सोच कप प्रोत्साहित करना।
  • सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संकल्प (आरएसएस) समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच कर ‘पंच परिवर्तन’ के बहु-मूल्य आंदोलन साथ राष्ट्र और समाज निर्माण के लिए प्रयासरत है।

 

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