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आसों दोज (आशा दोज) पर्व क्यों और कैसे मनाया जाता है?

आशा दोज (आशामाई दोज): वैशाख मास की कृष्ण पक्ष की दूज के दिन आशा द्वितीया, आसमाई (आशामाई दोज) या आसों दोज मनाई जी है, इस वर्ष 2025 में यह मंगलवार 15 अप्रैल को मनाई जाएगी। मध्य भारत के बुन्देलखंड अंचल में आसों दूज का खास महत्व है। यह व्रत कार्य सिद्धि के लिए किया जाता है।

आशा दोज का पर्व महिलाएं अपनी संतानों की खुशहाली और परिवार की समृद्धि के लिए पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ इसे मनाती हैं।

आशा दोज (आसों दोज) क्यों मनाया जाता है?

आसों दोज पर्व मनाने के कई कारण हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं,

  • संतान की सुरक्षा और समृद्धि के लिए यह व्रत मुख्य रूप से उन महिलाओं द्वारा किया जाता है जिनकी संतान होती है, खासकर पुत्रों की माताएं इसे विशेष रूप से करती हैं। इसका उद्देश्य अपनी संतानों की सुरक्षा और समृद्धि की कामना करना है।
  • आशा और विश्वास का प्रतीक यह पर्व जीवन में आशा और विश्वास बनाए रखने का संदेश देता है। जब व्यक्ति निराश होता है, तो आसमाई की पूजा उसे नई उम्मीद और सकारात्मकता प्रदान करती है।
  • कार्य सिद्धि के लिए, धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
  • मनोकामना पूर्ति हेतु, जिन लोगों की कोई इच्छा पूरी नहीं होती है, वे आसमाई (आशामाई) या आशा माता को प्रसन्न करने और अपने जीवन को सुखी बनाने हेतु यह व्रत कर सकते हैं।
  • पारिवारिक सुख-शांति हेतु, इस व्रत को करने से परिवार में सुख-शांति और खुशहाली बनी रहती है।

आशा दोज (आसों दोज) पर्व कैसे मनाया जाता है?

आसों दोज का पर्व विशेष विधि-विधान से मनाया जाता है,

  • इस दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं।
  • पूजा के लिए पान का पत्ता, गोपी चंदन, लकड़ी का पाट या छोटी चौकी, देवी आसामाई (आशामाई) की तस्वीर, मिट्टी का दिया, कलश, रोली, अक्षत, धूप, दीप, घी, नैवेद्य में हलवा-पूरी और सूखा आटा एकत्रित किया जाता है।
  • एक स्वच्छ पान के पत्ते पर सफेद चंदन से आसामाई (आशामाई) की मूर्ति बनाई जाती है।
  • पूजा स्थल पर चौक पूरकर मिट्टी का कलश स्थापित किया जाता है और दीपक प्रज्वलित  किया जाता है
  • पान के पत्ते पर आसामाई (आशामाई) की बनाई गई मूर्ति के सामने 4 कौड़ियां रखी जाती हैं और उनकी पूजा की जाती है।
  • आटे के चौक के पास गांठों वाला एक मांगलिक सूत्र रखा जाता है।
  • उसके बाद षोडशोपचार विधि से आसामाई (आशामाई) की पूजा की जाती है।
  • भोग के लिए सात ‘आसें’ यानी एक विशेष प्रकार की कम मीठी और मोटी तथा आकर में छोटी पूरी बनाई जाती हैं, जिसे व्रत करने वाली महिला ही खाती है। इसके अलावा हलवा-पूरी का भोग लगाया जाता है।
  • भोग लगाते समय, महिला उस गांठों वाले मांगलिक सूत्र को धारण करती है।
  • कौड़ियों का खेल भी होता है जिसमें घर का सबसे छोटा बच्चा उन 4 कौड़ियों को पटिये पर डालता है, जिन्हें महिला अपने पास रखती है और हर वर्ष उनकी पूजा करती है।
  • पूजा की समाप्ति से पहले या अंतिम भाग में, आसमाई की कथा सुनी या पढ़ी जाती है।
  • पूजा संपन्न होने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। इस दिन भोजन में नमक का प्रयोग वर्जित होता है। भोग लगाने के बाद सभी को प्रसाद वितरित किया जाता है।

आसामाई (आशामाई) की पूजा के लिए सामग्री :

पान का पत्ता, गोपी चंदन, लकड़ी का पाट, आसामाई की या देवी माता की फोटो, कलश (मिट्टी), रोली, अक्षत, फूल, धूप, दीपक, घी, रुई की बत्ती, नैवेद्य (हलवा पूड़ी), सूखा आटा।

संतान की खुशहाली और परिवार की समृद्धि के लिए पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाने वाला आशा दोज (आसों दोज) पर्व आशा और पारिवारिक प्रेम का प्रतीक है।

 

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