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हनुमानजी ने माता अंजनी का कौन सा कर्ज चुकाया था?

स्वर्गलोक जाने से पहले भगवान विष्णु के अवतार भगवान श्रीराम ने हनुमानजी को धर्म और अपने भक्तों की रक्षा का भार सौंपा था इसलिए अमरता के वरदान के साथ हनुमानजी आज भी धरती पर ही निवास करते हैं।

इस कारण से हनुमानजी को जागृत देवता या कलियुग का देवता भी माना जाता है और जो प्रभु श्री राम के भक्ति में लीन रहते हुए उनके भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।

हनुमानजी के संबंध में कुछ कथाएं वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस में तो मिलती है परंतु कुछ ऐसी कथाएं भी हैं जी इन दोनों ग्रंथों में नहीं मिलती है लेकिन ऐसी कई कथाएं दक्षिण भारत की रामायण या अन्य रामायण में मिलती है।

इसी तरह की एक कथा है हनुमानजी और उनकी माता अंजनी से जुड़ी हुई है। बहुत कम पुत्र हुए हैं जिन्होंने अपनी माता के दूध का कर्ज चुकाया है, लेकिन हनुमानजी एक ऐसे पुत्र है जिन्होंने अपनी माता का ऐसा कर्ज चुकाया है जो कि धरती पर आज तक कोई नहीं चुका पाया।

हनुमानजी की माता अंजनी को श्राप

पुराणिक कथाओं के अनुसार माता अंजनी पूर्व जन्म में देवराज इंद्र के दरबार में अप्सरा पुंजिकस्थला थीं। एक बार भूलवश एक ऋषि पर फल फेंके जाने से ऋषि ने क्रोधित होकर पुंजिकस्थला को श्राप दे दिया कि, जा तू वानर की तरह स्वभाव वाली वानरी बन जा, ऋषि के श्राप को सुनकर पुंजिकस्थला ऋषि से क्षमा याचना मांगने लगी, तब ऋषि ने दया दिखाई और कहा कि तुम्हारा वह रूप भी परम तेजस्वी होगा। तुमसे एक ऐसे पुत्र का जन्म होगा जिसकी कीर्ति और यश से तुम्हारा नाम युगों-युगों तक अमर हो जाएगा, इस तरह वानर रूप के लिए माता अंजनी को वीर पुत्र का आशीर्वाद मिला।

यह भी कहा जाता है कि माता अंजनी ने कठोर तप किया और तब भगवान शिव के आशीर्वाद से उन्हें एक पराक्रमी पुत्र प्राप्ति का वरदान प्राप्त किया। इस तपस्या के फलस्वरूप वे हनुमानजी की माता बनीं।

माता अंजनी का कौन सा कर्ज चुकाया?

माता अंजनी ने हनुमानजी को बहुत प्यार और दुलार से पालन करके बड़ा किया। और जब हनुमानजी बड़े हुए, तो उन्होंने एक दिन, माता अंजनी से पूछा कि माता! मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं? आपके प्रति पुत्र होने का क्या कर्तव्य है?

तब माता अंजनी ने प्रेमपूर्वक कहा कि “वत्स, जब तक मैं इस पृथ्वी पर हूं, मेरा पालन-पोषण और देखभाल तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। लेकिन मेरा एक और ऋण है जो तुम्हें चुकाना होगा।”

हनुमानजी ने जिज्ञासा वश पूछा, “मां, वह कौन सा ऋण है?

माता अंजनी ने उत्तर दिया कि “हर माता को अपने पुत्र से एक ही अपेक्षा होती है कि वह अपने जीवन को धर्म, भक्ति और परोपकार में लगाए। जब तुम भगवान श्रीराम की सेवा करोगे और उनकी भक्ति में लीन रहोगे, तभी मैं समझूांगी कि तुमने मेरा ऋण चुका दिया।”

तब, हनुमानजी ने अपनी माता को वचन दिया कि वे अपना संपूर्ण जीवन भगवान श्रीराम की सेवा में समर्पित कर देंगे।

हनुमानजी की रामभक्ति

और फिर हनुमानजी रामभक्ति में लीन हो गए, कुछ दिनों पश्चात उनकी भेंट प्रभु श्रीराम और उनके अनुज श्री लक्ष्मण जी से एक पर्वत पर हुई। इसके बाद उनकी राम भक्ति की कथा तो जन-जन में और उनके भक्तों के मन में व्याप्त है।

उन्होंने श्रीराम की आज्ञा से माता सीता को खोजने के लिए लंका प्रस्थान किया,  लंका का दहन किया, संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण को जीवन दान दिया। फिर जब युद्ध समाप्त हो गया तो प्रभु श्रीराम ने कहा कि, कहो हनुमान तुम्हारी क्या इच्‍छा है?

हनुमानजी ने कभी भी अपने लिए कुछ नहीं मांगा, बल्कि निस्वार्थ भाव से अपने प्रभु राम की सेवा में लगे रहने का वरदान मांगा, तथा हनुमानजी ने कहा प्रभु यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अपनी माता अंजनी के पास जाना चाहता हूं और यदि आप कृपा करेंगे तो मेरे साथ चलें। तब प्रभु श्रीराम ने कहा तथास्तु।

फिर हनुमानजी अपने प्रभु श्रीराम को लेकर अपने घर गए और उन्होंने माता अंजनी को प्रभु श्रीराम के दर्शन करवाए।   माता अंजनी यह देखकर आश्‍चर्य, भक्तिभाव से भावविभोर होकर दोनों को देखने लगी। तब माता अंजनी ने हनुमानजी से कहा कि बेटा तुमने आज मेरा सारा कर्ज चुका दिया। तुमने न सिर्फ प्रभु श्रीराम की सेवा कि और उन्हें यहां लेकर भी आ गये, लोग तो मरने के बाद प्रभु के धाम जाकर उनसे मिलते हैं तू तो प्रभु को ही यहां ले आया। लोग तीर्थ में यात्रा करके प्रभु के दर्शन करने जाते हैं तू तो समस्त तीर्थ जिनके चरणों में हैं उन्हें ही ले आया मेरे द्वार पर, धन्य है ऐसा पुत्र और धन्य है उनके स्वामी प्रभु श्रीराम.

माता अंजनी और राम भक्त हनुमान जी की यह कथा हमें सिखाती है कि माता-पिता का सबसे बड़ा ऋण उनकी आज्ञा और उनकी इच्छाओं का सम्मान करके चुकाया जाता है।

हनुमानजी ने माता की सेवा के लिए भगवान श्रीराम की भक्ति को चुना, जो हर भक्त के लिए प्रेरणादायक है। यही नहीं उन्होंने जिस प्रभु की तलाश में लोग तप और ध्यान करते हैं वे उन्हें ही अपने माता पिता के लिए अपने घर लेकर आ गए।

चिरंजीवी हनुमानजी का निवास

हनुमानजी चिरंजीवी हैं और वह कलियुग के 7 चिरंजीवियों में से एक हैं तथा वह इस वर्तमान युग, कलियुग के अंत तक पृथ्वी पर रामभक्ति में लीन रह जीवित रहेंगे।

कलयुग में हनुमानजी गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं. यह पर्वत कैलाश पर्वत के उत्तर में है. श्रीमद् भागवत पुराण में भी इस बात का उल्लेख भी मिलता है.

आनंद रामायण में हनुमानजी के विशेष बारह नाम इस प्रकार बताए गए हैं,

हनुमान, अंजनीसुत, वायुपुत्र, महाबल, रामेष्ट, फाल्गुनसखा, पिंगाक्ष, अमितविक्रम, उदधिक्रमण, सीतोशोकविनाशन, लक्ष्मणप्राणदाता, दशग्रीवदर्पहा।

हनुमानजी के हर नाम की अलग अलग महिमा और महत्व है और हर नाम अलग अलग तरीके से प्रयोग किया जाता है.

2025 को हनुमान वर्ष क्यों कहते हैं?

अंक ज्योतिष के अनुसार, अंक 9 हनुमान जी की ऊर्जा के साथ पूरी तरह से मेल खाता है, जबकि ज्योतिष हनुमान जी के शासक ग्रह मंगल के मजबूत प्रभाव को उजागर करता है। ये सभी शक्तियां मिलकर 2025 को हनुमान जी का वर्ष बनाती हैं।

 

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