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भगवान महावीर ने प्राणी मात्र की रक्षा के लिए अहिंसा परमो धर्म की अलख जगाई

जैन धर्म में भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (१३) को मनाया जाता है। यह पर्व जैन धर्म के २४वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक के उपलक्ष में मनाया जाता है। इसे महावीर जयंती के नाम से भी जाना जाता है और यह जैनों का सबसे प्रमुख पर्व है।

महावीर जयंती के इस महोत्सव पर जैन मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है। कई जगहों पर जैन समुदाय द्वारा शोभा यात्रा और अहिंसा रैली निकाली जाती है। इस अवसर पर गरीब एवं जरुरतमंदों को दान दिया जाता है। कई राज्य सरकारों द्वारा मांस एवं मदिरा की दुकाने बंद रखने के निर्देश दिए जाते हैं और राज्यों में राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाता है।

तीर्थंकर महावीर स्वामी, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे उन्होंने अपने स्वयं जीवन के माध्यम से अहिंसा, सत्य, करुणा और आत्म-साधना के अद्भुत सिद्धांतों को प्रस्तुत किया। उनकी शिक्षाएं (Teachings of Mahavir Swami) आज भी हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।

महावीर जयंती
Mahavira भगवान महावीर स्वामी, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर

जानें भगवान महावीर की अद्भुत शिक्षाएं:

  • अहिंसा परमो धर्म (Non-violence is the Supreme Religion): तीर्थंकर महावीर स्वामी ने सिखाया कि अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। यह केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि विचार, वाक् और कर्म में भी अहिंसा का पालन करना चाहिए।
  • सत्य का महत्व (Truth is Eternal): तीर्थंकर महावीर ने कहा, ‘सत्य ही मोक्ष का मार्ग है।’ सत्य बोलना और सत्य पर चलना ही जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है।
  • आत्म-संयम और साधना (Self-Discipline and Meditation):  तीर्थंकर महावीर स्वामी ने आत्म-संयम के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा, ‘जो अपने आप पर विजय प्राप्त करता है, वही सच्चा विजेता है।’
  • अपरिग्रह का सिद्धांत (Non-possessiveness): तीर्थंकर महावीर ने सिखाया कि भौतिक वस्तुओं के प्रति लगाव दुख का कारण बनता है। इसलिए, अपरिग्रह (आसक्ति रहित जीवन) ही सच्चे सुख का मार्ग है।
  • करुणा और सहानुभूति (Compassion and Empathy): तीर्थंकर महावीर स्वामी ने हमेशा प्रेम और करुणा के साथ जीने की शिक्षा दी। उन्होंने कहा, ‘जैसा व्यवहार दूसरों से चाहो, वैसा ही व्यवहार स्वयं करो।’
  • मुक्ति के चार स्तंभ (The Four Pillars of Liberation): तीर्थंकर महावीर ने मुक्ति के सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक आचरण, सम्यक साधना स्तम्भ बताए।
  • मौन और ध्यान का महत्व (Silence and Meditation) : तीर्थंकर महावीर स्वामी ने मौन के महत्व को बताया। उन्होंने कहा, ‘मौन ही सबसे बड़ा शक्ति का रूप है।’

महावीर स्वामी के विचारों से प्रेरणा

महावीर जयंती के इस शुभ अवसर पर हमें उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाना चाहिए और शांति, सच्चाई, और करुणा के संदेश को फैलाना चाहिए। ‘जीवन में सच्चे सुख के लिए अहिंसा, सत्य और आत्म-संयम के मार्ग पर चलें।’

शस्त्रों के अनुसार भगवान महावीर वर्तमान अवसर्पिणी काल की चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर थे और हिंसा, पशुबलि, जात-पात का भेद-भाव जिस युग में बढ़ गया, उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य,अहिंसा का पाठ पढ़ाया। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को सबसे उच्चतम नैतिक गुण बताया।

उनके निर्वाण का स्थान, वर्तमान बिहार में पावापुरी , जैनियों के लिए एक तीर्थ स्थल है। हेमचंद्र के परिशिष्ठपर्वन में कालक्रम के आधार पर, कुछ इतिहासकारों ने तीर्थंकर महावीर की मृत्यु को लगभग 468-467 ईसा पूर्व या 477 ईसा पूर्व माना है।

भगवान महावीर स्वामी का जन्म ईसा से ५९९ वर्ष पूर्व क्षत्रियकुंड , जमुई (बिहार), भारत मे हुआ था। २३वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी के निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त करने के 188 वर्ष बाद इनका जन्म हुआ था।

माना जाता है कि, हर तीर्थंकर के जीवन में पंचकल्याणक मनाए जाते है। गर्भ अवतरण के समय तीर्थंकर भगवान महावीर की माता त्रिशला ने 14 शुभ स्वप्न देखे थे जिनका फल राजा सिद्धार्थ ने बताया था।

 

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